Monday, 25 May 2020

The under achieving school by John Holt असफल स्कूल


School is a Cancer
Anurag Mudgal

“अनिवार्य शिक्षा मनुष्य के सबसे सत्तावादी और विनाशकारी आविष्कारों में से एक है |
                                                           (जॉन होल्ट)
स्कूल के बारे में नाम आते ही हमारे सामने नाम आता है एक भवन, उसमें पढ़ने-लिखने की व्यवस्थाएं, शिक्षक और बहुत से एक समान दिखने वाले बच्चे |
लेकिन इतना ही स्कूल नहीं है .... यह तो इससे भी इतर बहुत आगे है |
लोग भले ही इसे पढ़ने-लिखने या सीखने की जगह कहते हो लेकिन अभी यह जिस रूप में है सीखने की जगह तो यह बिलकुल भी नहीं है | समस्या यह है की स्कूलों को यह लगता ही नहीं है कि हम करके सीखते है | जॉन हॉल्ट के शब्दों में समझे तो स्कूलों को लगता है की चीजों को तब तक नहीं करना चाहिए जब तक हम उन्हे करना नहीं सीख जाते |
दरअसल वर्षों से हमारे अचेतन में घुसी शिक्षक सत्ता का अहम हमे हमारी सत्ता के अहंकार को त्यागने से रोकता है | हम बहुत बार शिक्षा के मूर्त रूपों में परिवर्तन के भाषण तो करते है लेकिन अपने-अपने अनुकूलनीय क्षेत्रों को त्यागने को तैयार नहीं रहते क्योंकि हमें हमारी सत्ता के छिन जाने की शंका रहती है |
हम जानते है की बच्चों को खुली कक्षाओं में सीखना अच्छा लगता है | वे कतार बद्द सीधी पंक्तियों में 2 by 4 के क्षेत्रफलों के गणित में नहीं फसतें | उन्हे सीखने के लिए खुलापन चाहिए जिसे वे पसंद करते है | प्रत्येक जीव में बच्चों की स्वाभाविक पृकृति भागना, दौड़ना, खेलना होती है | लेकिन हम उन्हे एक बंद जेल की चारदीवारों में कैद करते है जिसमें उसे उतना ही सीखना है जितना शिक्षक चाहे, वैसे ही सीखना है जैसे शिक्षक चाहे | इन अप्राकृतिक प्रक्रियाओं का ही नतीजा है की 50 प्रतिशत से ज्यादा बच्चे आज अपने कक्षा लेवल के आकलनों में हर स्कूल में संघर्ष कर रहे होते है |
ऐसा नहीं है की कोई शिक्षक ऐसा नहीं करता लेकिन जो शिक्षक ऐसा करना चाहता है उस शिक्षक को भी उस सिस्टम में ढलना पडता है | क्योंकि जैसे ही कोई शिक्षक किसी कक्षा को खुली छोडता है या जिस कक्षा से शोर आ रहा होता है तो स्कूल का प्रधानाध्यापक उस कक्षा में आ धमकाता है | दरअसल वह प्रधानाध्यापक भी उसी प्रक्रियाओं का हिस्सा बन गया है | सत्ता का अनियंत्रण उसे भी असहज कर रहा होता है | उसे भी लगता है की स्कूलीतय प्रक्रियाओं के इतर यह हँगामा क्यों है ? यह सवाल उसे अपने को निरूपित करने का या अपने होने की स्वीकृती के प्रकटीकरण का जरिया बनता है |
स्कूल की ज़्यादातर प्रक्रियाओं में बच्चों मौन होते है या यूं कहें की बच्चों ने वातावरणीय प्रक्रियाओं से अपने को अनुकूलित करते हुये चुप रहने में ही भलाई समझ ली है | हम अपनी कक्षाओं में झाँके तो कक्षा में 50 प्रतिशत से अधिक बच्चे ऐसे होते है जो स्कूल तो आते है लेकिन न तो वे शिक्षक से कोई संवाद करते और न ही शिक्षक को उनसे संवाद में कोई रूचि होती है | ज़्यादातर कक्षाओं और अन्य स्कूल प्रक्रियाओं में शिक्षक और बोर्ड नियमित रूप से प्रवचन देते है जिन्हें बिना गर्दन हिलाए बच्चों को सुनना पड़ेगा | न सिर्फ सुनना पड़ेगा बल्कि आपके समझ में कुछ आया या नहीं, लेकिन आपको उसका काम पूरा करके लाना ही पड़ेगा यदि अपने गालों की लालिमा नहीं चाहिए तो | यदि सरकारी पाबंदी में कुछ लोग ख्याल कर लेंगे तो वे आपको बख्स देंगे ऐसा बिल्कुल ही नहीं है | अपने शब्द बाण से बच्चों का ऐसा हाल करेंगे की कभी वो अपने आत्मविश्वास को फिर से खड़ा नहीं कर पाएगा |
बोद्धिक परिचय नेतृत्व के इस संघर्ष में शिक्षक कृपा से कुछ गिने-चुने बच्चों होते हैं, जो पूरे स्कूल को देखने का जरियाँ बन जाते है | चाहे कक्षा कक्षीय प्रक्रियाए हो, प्रात: कालीन सभा हो, स्कूल का कोई इवैंट हो, वे गिने-चुने बच्चे ही बार-बार प्रदर्शन हेतु पेश कर दिये जाते है | इसी प्रदर्शन की ओट में अपनी शैक्षिक विचारधारा के सफलता के झंडो को लहराया जाता है | यकीन नहीं आए तो कल से अपने-अपनी कक्षाओं में गिनना शुरू कर दे कितने बच्चे है जो कक्षा में चर्चा में नहीं बोलते, बालसभा में नहीं बोलते ( बाल सभा तो नाम की है दरअसल ये शिक्षक सभा ही होती है – जिसमें शिक्षक के स्वविचारों का बच्चों की स्वीकृति से तुष्टीकरण हो रहा होता है), कितने बच्चे है जो प्रात:कालीन सभा की गतिविधियों में भाग नहीं लेते, खेलों में नेतृत्व नहीं करते, स्कूल कार्यक्रमों में प्रदर्शन नहीं करते है | मैं यकीन से कह सकता हूँ की यह एक बहुत बड़ी संख्या है | लेकिन यह बड़ी संख्या जब स्कूल में प्रवेश की थी तो इतनी बड़ी नहीं थी | इस पर भी यकीन नहीं आए तो अपनी प्रथम कक्षा में दौरा करके सकते जिसमें 75 प्रतिशत से ज्यादा बच्चे अपने आप को स्वतंत्र एवं नैसर्गिक रूप से अभिव्यक्त कर रहे होते है | जिन्हे हमने हमारी अशैक्षिक प्रक्रियोंओं से कुचल दिया होता है |
दरअसल स्कूल बच्चों की प्राकृतिक रचनात्मकता का दमन कर देता है | बच्चों के प्राकृतिक संवेदनाओं के प्रकटीकरण जैसे हँसना, रोना, गुस्सा होना, नाराज होना आदि को तो मूल से नष्ट करने पर उतारू हो जाता है | तभी तो जो बच्चा ये सभी क्रियाएँ स्कूल के प्रवेश के समय खुल कर कर रहा होता है वह आयु के बढ्ने के साथ करना छोड़ देता है | नतीजा मनोवैज्ञानिक समस्याओं का एक बड़ा क्षेत्र आज खुल गया है जो बच्चों के भविष्य को बर्बाद करता है |
जबकि होना यह चाहिए की बच्चों में सीखने के प्रति ज़िम्मेदारी पैदा की जाए जिसमें अभिभावक उचित शिक्षक के साथ संवाद की स्थिति में रहे | स्कूल केवल आगे की शैक्षिक प्रक्रियों के लिए रिसोर्स की उपलब्द्द्ता का निर्वहन करे | अब शिक्षक मिलकर के उन सभी दक़ियानूसी प्रक्रियाए (शैक्षिक अंधविश्वास) को दूर कर अपने अनूरूप विध्यालय की रचना करे | जिसमें कक्षाओं के संचालन, रूप रेखा, समयसीमा लोकतान्त्रिक व आवश्यकताओं के अनूरूप हो न की पूर्व निर्धारित आदेशों के | भय मुक्त वातावरण, उच्च तार्किक व मनोरंजक वातावरण हो जहां रचना और प्रयोग करने, अपने को खुलकर अभिव्यक करने की आज़ादी हो | शिक्षकों को स्कूल संरचना एवं निर्णय लेने की प्रक्रियाओं पर सम्पूर्ण नियंत्रण हो तथा जिन्हे हर पल कोई आंकलन न कर रहा हो | जो किसी भी तरह से अपने को आर्थिक और शैक्षिक रूप से असुरक्षित न समझे | 
हमें अब यह सोचने की और बढ़ना चाहिए की कैसे हम अपने पूरे समाज को एक ऐसी जगह में बदल पाये जहाँ सच में हमारे बच्चे सीख पाये | जहाँ सीखने में पैसे किसी तरह की रुकावट न हों | साथ ही सीखने के तरीके ज्यादा वास्तविक हों तथा जिन्हे सीखने के लिए किसी विशेष शब्दों की जरूरत न हों | जहाँ सीखना स्वीकृती से हों न की जबर्दस्ती से | हमें सामाजिक लोगो की गुणवत्ता का उपयोग करना होगा | स्कूलों में अधिकांश शिक्षक हमें विषय के उन सिद्दनतों की शिक्षा दे रहे होते है जिनको उन्होने अपने पूरे जीवन कल में न तो देखा होता है और न ही अनुभव किया होता है |  इसलिए हमें सामाजिक शिक्षा के उन तरीकों की ओर बढ़ना होगा जिनमें कम पैसे का उपयोग हो | गुणवत्ता पूर्ण ऐसे संसाधनों को हमने हमेशा ही नजरंदाज कर आर्थिक मुनाफे के स्कूली चक्रजाल  में हमने पूरी शिक्षा को फ़सा दिया है |
सभी को यह तो पता है की किसी कार्य को कैसे करना है लेकिन उन्हे यह पता ही नहीं है की उन्हे वह काम क्यों करना है | शिक्षकों की भी हालत इससे कुछ अलग नहीं लगती | अभी कुछ दिन पहले एक निजी स्कूल की पीटीएम में गया जहां कक्षा 4 की बच्ची को सभी जिले, मंत्रिमंडल और भी बहुत कुछ याद होने का दावा करके स्कूल की श्रेष्ठता सिद्द करने का प्रयास किया गया | जब मैंने पुंछा की क्या उसे मंत्रिमंडल क्या होता है और ये क्यों बनता है यह पता है क्या ? तो वे इस पर निरुत्तर हो कर प्रधानाचार्य से बात करने को कहने लगे बोले हम भी नहीं चाहते यह सब रटाना लेकिन क्या करे स्कूल जो कहेगा करना पड़ेगा | यही हालत अन्य स्कूल में भी है | सोशल मीडिया पर भी बहुत से विडियो देखता हूँ जिनमें बच्चों को सामान्य ज्ञान या रटी हुयी चीजों के प्रदर्शन को श्रेष्ठ बताकर कुछ शिक्षक पेश करते है जो कहीं से भी उचित नहीं है |
दरअसल लोकतंत्र के नाम पर हमको बहुत से झूँठ परोस दिये गए है | उनमें से एक अनुशासन भी है | जिसके नाम पर नियंत्रित शैक्षिक दमन की प्रक्रियायेँ रच दी गयी है जिनमें शिक्षक से लेकर बच्चे तक संकुचित मानसिक अवस्था रच कर उसे ही अपना सर्वश्रेष्ठ मान लेने का मुगालचा पाल लेते है |
अनिवार्य शिक्षा ने मनुष्य समाज का सबसे अधिक अहित किया है | हमें इनके विकल्पों की तरफ जल्द ही बढ़ना होगा | हमें स्कूलों को खत्म कर देना चाहिए | मैं जानता हूँ इस विचार के विरुद्द एक बहुसंख्यकवाद हमेशा खड़ा होगा | हर क्रांतिकारी विचार का इसी हद तक विरोध होता है | लेकिन इस दिशा में हमें अब सोचना पड़ेगा | मैं यह भी जानता हूँ की शायद हमारी पीढ़ी में मेरा यह विचार जमीनी हकीकत का रूप न ले सके | दरअसल ऐसा भी नहीं है की इन विचारों पर कोई प्रयास शुरू नहीं हुआ है |  बहुत सी संस्थाओं ने स्कूल को सीखने की अच्छी प्रकृतिक जगह के रूप विकसित करने का प्रयास किया है | हालांकि वे भी अभी अनिवार्य शिक्षा के सरकारी फरमानों के चक्र की जकड़ से मुक्त नहीं है |
मेरा विजन अनिवार्य शिक्षा को जड़ से समाप्त कर समाज व्यवस्था को सीखने की सहज कार्यशाला के रूप में विकसित कर देने के दूरगामी कठिन लक्ष्य से है |